सोमवार, 22 अगस्त 2016

संस्कृत बोलने वाला गाँव

इस गांव में सब्ज़ी खरीदिए संस्कृत में
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भारत में केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत या जर्मन पढ़ाए जाने की बहस से कर्नाटक का मत्तूरु गाँव लगभग अछूता है ।

कर्नाटक की राजधानी बैंगलुरु से ३०० किलोमीटर दूर स्थित मत्तूरु गाँव के इस बहस से दूर होने की वजह थोड़ी अलग है । यह एक ऐसा गाँव है जहाँ संस्कृत रोज़मर्रा की भाषा है ।

इस गाँव में यह बदलाव ३२ साल पहले स्वीकार की गई चुनौती के कारण आया । १९८१--८२ तक इस गाँव में राज्य की कन्नड़ भाषा ही बोली जाती थी ।

कई लोग तमिल भी बोलते थे, क्योंकि पड़ोसी तमिलनाडु राज्य से बहुत सारे मज़दूर क़रीब १०० साल पहले यहाँ काम के सिलसिले में आकर बस गए थे ।

इस गाँव के निवासी और स्थानीय शिमोगा कॉलेज में वाणिज्य विषय पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर एमबी श्रीनिधि ने बताया, "दरअसल यह अपनी जड़ों की ओर लौटने जैसा एक आंदोलन था, जो संस्कृत-विरोधी आंदोलन के ख़िलाफ़ शुरू हुआ था । संस्कृत को ब्राह्मणों की भाषा कहकर आलोचना की जाती थी । इसे अचानक ही नीचे करके इसकी जगह कन्नड़ को दे दी गई ।"

प्रोफ़ेसर श्रीनिधि कहते हैं, "इसके बाद पेजावर मठ के स्वामी ने इसे संस्कृत भाषी गाँव बनाने का आह्वान किया । हम सबने संस्कृत में बातचीत का निर्णय करके एक नकारात्मक प्रचार को सकारात्मक मोड़ दे दिया । मात्र १० दिनों तक प्रतिदिन दो घंटे के अभ्यास से पूरा गाँव संस्कृत में बातचीत करने लगा ।"

सभी समुदायों की भाषा
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तब से ३,५०० जनसंख्या वाले इस गाँव के न केवल संकेथी ब्राह्मण ही नहीं बल्कि दूसरे समुदायों को लोग भी संस्कृत में बात करते हैं. इनमें सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित तबका भी शामिल है ।

संकेथी ब्राह्मण एक छोटा सा ब्राह्मण समुदाय है, जो सदियों पहले दक्षिणी केरल से आकर यहाँ बस गया था ।

पूरे देश में क़रीब ३५,००० संकेथी ब्राह्मण हैं और जो कन्नड़, तमिल, मलयालम और थोड़ी-थोड़ी तेलुगु से बनी संकेथी भाषा बोलते हैं. लेकिन इस भाषा की कोई अपनी लिपि नहीं है ।

त्रिभाषा सूत्र
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स्थानीय श्री शारदा विलास स्कूल के ४०० में से १५० छात्र राज्य शिक्षा बोर्ड के निर्देशों के अनुरूप कक्षा छह से आठ तक पहली भाषा के रूप में संस्कृत पढ़ते हैं ।

कर्नाटक के स्कूलों में त्रिभाषा सूत्र के तहत दूसरी भाषा अंग्रेज़ी और तीसरी भाषा कन्नड़ या तमिल या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा पढ़ाई जाती है ।

स्कूल के संस्कृत अध्यापक अनंतकृष्णन सातवीं कक्षा के सबसे होनहार छात्र इमरान से संस्कृत में एक सवाल पूछते हैं, जिसका वो फ़ौरन जवाब देता है ।

संस्कृत का फ़ायदा
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इमरान कहते हैं, "इससे मुझे कन्नड़ को ज़्यादा बेहतर समझने में मदद मिली."
उत्तरी कर्नाटक के सिरसी ज़िले के रहने वाले अनंतकृष्णन कहते हैं, "इमरान की संस्कृत में रुचि देखने लायक है ।"

अनंतकृष्णन कहते हैं, "यहाँ के लोग अलग हैं. किंवदंती है कि यहाँ के लोगों ने विजयनगर के राजा से भूमि दान लेने से मना कर दिया था । क्या आपको पता है कि इस गाँव में कोई भूमि विवाद नहीं हुआ है ?"

संस्कृत के विद्वान अश्वतनारायण अवधानी कहते हैं, "संस्कृत ऐसी भाषा है जिससे आप पुरानी परंपराएँ और मान्यताएँ सीखते हैं । यह ह्रदय की भाषा है और यह कभी नहीं मर सकती ।"

संस्कृत भाषा ने इस गाँव के नौजवानों को इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए गाँव से बाहर जाने से रोका नहीं है ।

संस्कृत सीखने का फ़ायदा
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क्या संस्कृत सीखने से दूसरी भाषाएँ, ख़ासकर कम्प्यूटर विज्ञान की भाषाओं को सीखने में कोई मदद मिलती है ?

बैंगलुरु की एक आईटी सॉल्यूशन कंपनी चलाने वाले शशांक कहते हैं, "अगर आप संस्कृत भाषा में गहरे उतर जाएं तो यह मदद करती है. मैंने थोड़ी वैदिक गणित सीखी है जिससे मुझे मदद मिली । दूसरे लोग कैलकुलेटर का प्रयोग करते हैं जबकि मुझे उसकी ज़रूरत नहीं पड़ती ।"

हालांकि वैदिक स्कूल से जुड़े हुए अरुणा अवधानी कहते हैं, "जीविका की चिंता की वज़ह से वेद पढ़ने में लोगों की रुचि कम हो गई है । स्थानीय स्कूल में बस कुछ दर्जन ही छात्र हैं ।"

मत्तूरु में संस्कृत का प्रभाव काफ़ी गहरा है । गाँव की गृहिणी लक्ष्मी केशव आमतौर पर तो संकेथी बोलती हैं, लेकिन अपने बेटे या परिवार के किसी और सदस्य से ग़ुस्सा होने पर संस्कृत बोलने लगती हैं ।

मज़दूरों के बच्चे
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मज़दूर के रूप में सुपारी साफ़ करने वाले संयत्र में काम करने वाली तमिल भाषी चित्रा के लिए भी स्थिति ज़्यादा अलग नहीं है । वो कहती हैं, "हम संस्कृत समझ लेते हैं. हालांकि हम में से कुछ इसे बोल नहीं पाते, लेकिन हमारे बच्चे बोल लेते हैं ।"

प्रोफ़ेसर श्रीनिधि कहते हैं, "यह विवाद बेकार है । जिस तरह यूरोप की भाषाएँ यूरोप में बोली जाती हैं उसी तरह हमें संस्कृत बोलने की ज़रूरत है । संस्कृत सीखने का ख़ास फ़ायदा यह है कि इससे न केवल आपको भारतीय भाषाओं को बल्कि जर्मन और फ़्रेंच जैसी भाषाओं को भी सीखने में मदद मिलती है ।"
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रविवार, 31 जुलाई 2016

दुनिया के 200 विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है संस्कृत

!!!---: दुनिया के 200 विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है संस्कृत :---!!!
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संस्कृतृ-भाषा मनुष्य को जोडती है । यह राष्ट्रवाद को जन्म देती है । यह सबके सुख-दुःख का ध्यान रखती है । संस्कृत में ही आत्मिक, सामाजिक व शारीरिक विकास है । संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति का आधार स्तम्भ है। संसार की समृद्धतम भाषा ‘संस्कृत’ के रूप में सबसे उन्नत मानवीय समाज और विज्ञान की स्थापना की गयी। इस देवभाषा के अध्ययन मनन मात्र से ही मनुष्य में सूक्ष्म विचारशीलता और मौलिक चिंतन जन्म लेता है। सनातन संस्कृति के सभी प्रमुख साहित्यिक और वैज्ञानिक शास्त्र संस्कृत भाषा में ही हैं।

मैकाले की दुष्ट-योजना
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भारतीय शिक्षण-शैली को समाप्त करने के बाद मैकाले द्वारा भारतीयों से ‘भारतीयता’ को नष्ट करने का जो षड्यंत्र रचा गया । दुर्भाग्य से हम उसमें बुरी तरह फँस गए । फलस्वरूप तथाकथित आधुनिक या आंग्लभाषी शिक्षा-पद्धति से शिक्षित लोग अज्ञानतावश संस्कृत को सिर्फ पूजा-पाठ और कर्मकाण्डो से जुड़ा मानकर अवैज्ञानिक तथा अनुपयोगी मानने लगे। जबकि वास्तविकता यह है कि यह भाषा महज साहित्य, दर्शन और अध्यात्म तक ही सीमित नहीं है,अपितु गणित, विज्ञान, औषधि, चिकित्सा, इतिहास, मनोविज्ञान, भाषाविज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान जैसे अनन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

लंदन के सबसे बड़े स्कूलों में से एक सेंट जेम्स कान्वेंट स्कूल में,बच्चों का द्वितीयक भाषा के रूप में संस्कृत सीखना अनिवार्य है। भारत से विशेष तौर पर वहाँ संस्कृत के शिक्षकों की व्यवस्था की जाती है.ब्रिटिश शिक्षाविद डॉ. विल डुरंट के अनुसार “संस्कृत आधुनिक भाषाओं की जननी है। संस्कृत बच्चों के सर्वांगीण बोध ज्ञान को विकसित करने में मदद करती है।”

आधुनिक विषयों में संस्कृत में शोध
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ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कम्पयूटर क्षेत्र में भी संस्कृत के प्रयोग की सम्भावनाओं पर फ्रांस, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इंग्लैंड आदि विभिन्न देशों में शोध जारी है। वानस्पतिक सौंदर्य प्रसाधन (हर्बल कॉस्मैटिक्स) एवं आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के तेजी से बढ़ते प्रचलन से संस्कृत की उपयोगिता और बढ़ गयी है क्योंकि आयुर्वेद पद्धतियों का ज्ञान सिर्फ संस्कृत में ही लिपिबद्ध है।

अपनी सुस्पष्ट और छंदात्मक उच्चारण प्रणाली के चलते संस्कृत भाषा को ‘स्पीच थेरेपी टूल’ (भाषण चिकित्सा उपकरण) के रूप में मान्यता मिल रही है। जर्मन शिक्षाविद् पॉल मॉस के अनुसार “संस्कृत से सेरेब्रेल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है। अतएव किसी बालक के लिए उँगलियों और जुबान की कठोरता से मुक्ति पाने के लिए देवनागरी लिपि व संस्कृत बोली ही सर्वोत्तम मार्ग है। वर्तमान यूरोपीय भाषाएँ बोलते समय जीभ और मुँह के कई हिस्सों का और लिखते समय उँगलियों की कई हलचलों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है ।”

अब्दुल कलाम की यूनान-यात्रा
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साल 2007 में राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान डॉ. अब्दुल कलाम यूनान गए थे।वहाँ के आधिकारिक स्वागत कार्यक्रम में ग्रीस के प्रेजीडेंट कार्लोस पाम्पाडलीस ने डॉ कलाम के लिए “राष्ट्रपति महाभाग सुस्वागतं यवनदेशे” , इस संस्कृत वाक्यसे अपने भाषण का प्रारंभ किया। उन्होंने अपने उद्बोधन में संस्कृत का प्राचीन भारत और ग्रीक भाषा के सम्बन्ध के बारे में व्यापक प्रकाश डाला।

वैज्ञानिक कई दिनों तक ऐसी भाषा/लिपि के विकास में थे, जिसका संगणकीय प्रणाली में उपयोग कर,उसका संसार की किसी भी आठ भाषाओं मे उसी क्षण रूपांतर हो जाए। अंततोगत्वा ‘संस्कृत’ ही एकमात्र ऐसी भाषा नजर आई। फोर्ब्स पत्रिका 1985 के अंक के अनुसार दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है।

सुपर कंप्यूटर संस्कृत भाषा में
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संस्कृत ही संसार की सर्वोत्तम भाषा है, जो संगणकीय प्रणालीके लिए उपयुक्त है। नासा की एक आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक़ अमेरिका 6 और 7 वीं पीढ़ी के सुपर कंप्यूटर संस्कृत भाषा पर आधारित बना रहा है जिससे सुपर कंप्यूटर की अधिकतम सीमा तक उपयोग किया जा सके। परियोजना की समय सीमा 2025 (6 पीढ़ी के लिए) और 2034 (7 वीं पीढ़ी के लिए) है,इसके बाद दुनिया भर में संस्कृत सीखने के लिए एक भाषा क्रांति होगी।

पूरी दुनिया संस्कृत की ओर दौड़ रही है
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अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, और जापान जैसे बेहद तकनीकि पूर्ण देश वर्तमान में भरतनाट्यम और नटराज के महत्व के बारे में शोध कर रहे हैं। गौरतलभ है कि नटराज शिव जी का कॉस्मिक नृत्य है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सामने शिव या नटराज की एक मूर्ति है । इसी तरह ब्रिटेन वर्तमान में हमारे श्री चक्र पर आधारित एक रक्षा प्रणाली पर शोध कर रहा है। परन्तु हम भारतीय कुछ भी सीखने से पहले जबरन ENGLISH डकारने में लगे हैं.जबकि पूरी दुनिया संस्कृत की ओर दौड़ रही है.

संस्कृत भाषा वर्तमान में “उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी” तकनीक में इस्तेमाल की जा रही है। (वर्तमान में, उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी तकनीक सिर्फ रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में ही मौजूद हैं। भारत के पास आज “सरल किर्लियन फोटोग्राफी” भी नहीं है.

संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है। भारतीय वैज्ञानिकों को नव अनुसंधान की प्रेरणा संस्कृत से मिली. जगदीशचन्द्र बसु, चंद्रशेखर वेंकट रमण ,आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय, डॉ. मेघनाद साहा जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिकों को संस्कृत भाषा से अत्यधिक प्रेम था और वैज्ञानिक खोजों के लिए वे संस्कृत को ही आधार मानते थे।

वैज्ञानिक शोध संस्कृत भाषा में
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इनके अनुसार संस्कृत का प्रत्येक शब्द वैज्ञानिकों को अनुसंधान के लिए प्रेरित करता है। प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने विज्ञान में जितनी उन्नति की थी, वर्तमान में उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। महर्षियों का सम्पूर्ण ज्ञान एवं सार संस्कृत भाषा में निहित है। आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय विज्ञान के लिए संस्कृत शिक्षा को आवश्यक मानते थे। जगदीशचन्द्र बसु ने अपने अनुसंधानों के स्रोत संस्कृत में खोजे थे। डॉ. साहा अपने घर के बच्चों की शिक्षा संस्कृत में ही कराते थे और एक वैज्ञानिक होने के बावजूद काफी समय तक वे स्वयं बच्चों को संस्कृत पढ़ाते थे।

आधुनिक विज्ञान सृष्टि के रहस्यों को सुलझाने में बौना पड़ रहा है। अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न मंत्र-विज्ञान की महिमा से विज्ञन आज भी अनभिज्ञ है। उड़न तश्तरियाँ कहाँ से आती हैं और कहाँ गायब हो जाती हैं इस प्रकार की कई बातें हैं जो आज भी विज्ञान के लिए रहस्य बनी हुई हैं। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों से ऐसे कई रहस्यों को सुलझाया जा सकता है।

दुःखों में संस्कृत का सहारा लें
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विमान विज्ञान, नौका विज्ञान से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हमारे ग्रंथों से प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार के और भी अनगिनत सूत्र हमारे ग्रंथों में समाये हुए हैं, जिनसे आधुनिक विज्ञान को अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण दिशानिर्देश मिल सकते हैं। आज अगर विज्ञान के साथ संस्कृत का समन्वय कर दिया जाय तो अनुसंधान के क्षेत्र में बहुत उन्नति हो सकती है। हिन्दू धर्म के प्राचीन महान ग्रंथों के अलावा बौद्ध, जैन आदि धर्मों के अनेक मूल धार्मिक ग्रंथ भी संस्कृत में ही हैं। संस्कारी जीवन की नींव संस्कृत वर्तमान समय में भौतिक सुख-सुविधाओं का अम्बार होने के बावजूद भी मानव-समाज अवसाद, तनाव, चिंता और अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त है , क्योंकि केवल भौतिक उन्नति से मानव का सर्वांगीण विकास सम्भव नहीं है । इसके लिए आध्यात्मिक उन्नति अत्यंत जरूरी है। जिस समय संस्कृत का बोलबाला था उस समय मानव-जीवन ज्यादा संस्कारित था। यदि समाज को फिर से वैसा संस्कारित करना हो तो हमें फिर से सनातन धर्म के प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का सहारा लेना ही पड़ेगा।

200 विदेशी विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ायी जा रही है
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वर्तमान में ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और कोलम्बिया जैसे 200 से भी ज्यादा लब्ध-प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ायी जा रही है। नासा के पास 60,000 ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियों है जो वे अध्ययन का उपयोग कर रहे हैं माना जाता है कि रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं।

भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए संस्कृत का उत्थान आवश्यक
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दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्त करने के लिए है, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय इंडिया (भारत) में नहीं है। जो हैं भी वहाँ संस्कृत केवल साहित्य और कर्मकाण्ड तक सीमित है विज्ञान के रूप में नहीं। भारत को विश्वगुरु और विश्व में सिरमौर बनाने के लिए संस्कृत के पुनरुत्थान की आवश्यकता है। क्योंकि संस्कृत हमारी विरासत है और उस पर हमारा ही जन्म-सिद्ध अधिकार है।
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